किसी से उम्मीद न रखो शायरी – उम्मीद अच्छी है पर हर किसी से नहीं

किसी से उम्मीद न रखो शायरी – आज के दौर में हम अक्सर दूसरों से बहुत ज्यादा उम्मीदें लगा लेते हैं और जब वो उम्मीदें टूटती हैं, तो दिल को गहरी चोट पहुँचती है। यह शायरी कलेक्शन उन्हीं भावनाओं को शब्दों में पिरोने की एक कोशिश है।

यह पोस्ट उन सभी लोगों के लिए है जो उम्मीद टूटने के बाद होने वाले दर्द को शायरी के माध्यम से व्यक्त करना चाहते है। यहाँ आपको ऐसी शायरियाँ मिलेंगी जो बताती हैं कि उम्मीद अच्छी है पर हर किसी से नहीं। हमें हर किसी से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए और केवल खुद पर भरोसा करना चाहिए।

उम्मीद अच्छी है पर हर किसी से नहीं शायरी

मत रख उम्मीद ऐ दिल यहाँ किसी से वफ़ा की,
यहाँ लोग अपनी ज़रूरत के हिसाब से हाथ मिलाते हैं।

किसी-से-उम्मीद-न-रखो-शायरी (1)

फरेबी दुनिया का दस्तूर यही है,
यहाँ उम्मीद ही सबसे बड़ी भूल है।

गैरों से क्या गिला करना अपनी तन्हाई का,
दुख तब हुआ जब अपनों ने उम्मीदों का दम घोंटा।

सिख लिया है मैंने अब अकेले चलने का हुनर,
क्योंकि उम्मीदों के सहारे अक्सर रास्ते खो जाते हैं।

रिश्तों का सच बस इतना है मेरे दोस्त,
उम्मीदें खत्म होते ही रिश्ते दम तोड़ देते हैं।

मेरी उम्मीदों की कश्ती तो डूबनी ही थी मेरे दोस्त,
क्योंकि मैंने समंदर भी उन्हीं को चुना था जो मेरे न थे।

दिल दुखने की बस एक ही वजह है,
मैंने इंसानों से वफ़ा की उम्मीद की थी।

उम्मीद की डोर अक्सर कमज़ोर ही निकली,
जिन पर भरोसा था वही रुख मोड़ गए।

ज़ुबान खामोश है पर दिल में एक शोर है,
उम्मीद किसी से नहीं, बस अब खुदा पर ज़ोर है।

ऐतबार की दीवारें कच्ची ही अच्छी हैं,
गिर भी जाएं तो ज़्यादा चोट नहीं लगती।

जितनी कम उम्मीद, उतना ज़्यादा सुकून,
यही है ज़िंदगी जीने का नया जुनून।

लोग तो सिर्फ दिखावा करते हैं साथ होने का,
असल में उम्मीद ही वजह बनती है रोने का।

वक़्त ने सिखाया है कि हर चेहरा एक नकाब है,
उम्मीद रखना ही सबसे बड़ा अज़ाब है।

किसी से उम्मीद न रखो शायरी

कांच की उम्मीदें लेकर पत्थर के शहर में निकले थे,
चोट तो लगनी ही थी क्योंकि मेरे अपने ही पराये थे।

किसी-से-उम्मीद-न-रखो-शायरी (2)

मेरा भ्रम था कि वो मेरे दर्द को समझेंगे,
उम्मीद ने ही मुझे मेरे अपनों से दूर किया।

जिस दिन से उम्मीदों का दामन छोड़ा है मैंने,
ज़िंदगी थोड़ी मुश्किल पर सुकून भरी हो गई है।

उम्मीद की डोर अक्सर कमज़ोर ही निकली,
जिन पर भरोसा था वही रुख मोड़ गए।

वो जो कल तक मेरी हर बात पर जान देते थे,
आज उम्मीद टूटी तो पहचान तक छीन ली उन्होंने।

अब मैंने शिकायतों का पिटारा जला दिया है,
जब उम्मीद ही नहीं रही, तो गिले शिकवे कैसे?

भीड़ में रहकर भी खुद को अकेला पाया है,
जब जब दूसरों से उम्मीद का हाथ बढ़ाया है।

अकेले रहना सीख लो, क्योंकि सहारा देने वाले,
अक्सर बीच रास्ते में ही साथ छोड़ देते हैं।

सुकून की तलाश है तो उम्मीदों को दफन कर दो,
ये वो बोझ है जो इंसान को कभी बढ़ने नहीं देता।

चेहरे की मुस्कान को अगर ज़िंदा रखना है,
तो उम्मीद का रिश्ता सिर्फ खुद से रखना।

दिल को अब किसी की दस्तक का इंतज़ार नहीं,
क्योंकि हमने उम्मीदों का दरवाज़ा बंद कर दिया है।

जिनसे उम्मीद थी कि मरहम लगाएंगे,
वही ज़ख्मों को कुरेद कर चले गए।

उम्मीदें तो कांच की तरह होती हैं,
टूटने पर दर्द और चुभन दोनों देती हैं।

Final Words on किसी से उम्मीद न रखो शायरी

इस लेख का सार यही है कि उम्मीदें जितनी कम होंगी, जिंदगी में दर्द भी उतना ही कम होगा। दूसरों से वफा की उम्मीद करना अक्सर हमें तकलीफ ही देता है, इसलिए उम्मीद अच्छी है पर हर किसी से नहीं। हमें उम्मीद है कि इन शायरियों ने आपको जीवन की इस कड़वी सच्चाई को गले लगाने और खुद को पहले से ज्यादा मजबूत बनाने में मदद की होगी।

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